माँ बगलामुखी के भक्त की महिमा
माँ के सच्चे भक्त की पुकार
लेखक युसुप अली कुरेशी
अर्थात है पिताम्बरा बगलामुखी आ परम विद्या हो तीनो लोक की जननी हो मुसीबतों का नाश करने वाली हो शत्रु की जिव्हा को किलिल करने वाली त्रिशूल धारणी है। भगवती आप ही हो जब से में आप के मंदिर आकर आप के दर्शन किये तब से मुझे आत्म शक्ति मिल गई है आखो से अंधेरा हट गया है लड़खड़ाते पाँव में खड़े रहने की शक्ति आ गई है। जब ही तो धर्म ग्रंथ कहते है कि आप वर दे शप्रिया वीर भूषण भूषिता हो।
तुम आदिशक्ति हो यह ज्ञान बहुत देर बाद मिला तो शत्रुओ का नाश करने वाली त्रिशूल धारणी हो, तुम्हारे द्वार पर जो भक्त रोते हुए आता ओर हस्ते हुए जाता है बहुत देर से ज्ञात हुआ संसार मे इस लिए कहते है तुम बगलामुखी सर्वेति दुस्टानाम त्वाचमे च मुखं पदम स्तम्येति जिव्हांकीलय बुद्धि मत विनाशये ति तारणच स्थिर स्थिर मायान्ततो वदेत।
तुम कालाछी कालिका काली धवानन सुंदरी हो।
इस लिए विश्व के समस्त तांत्रिक तुम्हारे चरणों में माथा टेक तंत्र प्रयोग करते है में दिन हु, दुखी भयभीत हु,अज्ञानी हु। मंत्र जप आदि के विधान से परिचित नही हु। केवल चरणों मे आराधना के लिए केवल पुष्प लाया हूं। अश्रुओं की धारा लाया हूं। इस अश्रुधारा से कहि तेरे पवित्र चरण भीग नही जाए, इसलिए मंदिर की चोखट पर बेठकर अश्रुधारा बहा रहा हु। मेरे परिवार को संकट से बचा के मेने आचार्यो, संतो एव भक्त्तों से सुना है कि तुम सिद्ध विद्या, सिद्ध माता, सिद्ध सिद्धस्वरूपिणी हो। हरा हरिप्रिया हारा हरिणी हाटयुक तथा हरिरूपा, हरिधार, हरिगाक्षि, हरिप्रिया हेलुप्रिया है तुरता हित हिट स्वरूपणी हो। क्षमा क्षमा क्षिता क्षुद्रघष्टाविमषणा हो। इन्द्रप्रिया च इंद्राणी इन्द्रप्रस्त निवासिनी इन्द्राक्षी इन्द्रव्रजा च इन्द्रम धोक्षणि हो।
अध्वेद एवं द्वैत का ज्ञान मुझे समझ नही आया। निर्गुण सगुण की परिभाषा नही समझ पाया। ज्योतिषियो के बताए गए ग्रह दोषों को समाप्त करने के लिए धन लुटा चुका हूं। मगर लाभ के स्थान हानि उठा रहा हु। संकटों का पहाड़ का स्वरूप बढ़ता ही चला जा रहा है। टोटके तंत्रों से आस्था टूट चुकी है तेरे चरणों को अब पढ़कर सत्य कर रहा हूं मां अब मैं कहीं नहीं भट्ट को तेरे चरण तब तक नहीं छोडूंगा जब तक आप प्रसन्न हो मेरे परिवार को संकटों से मुक्त नहीं करोगी क्योंकि तुम परब्रह्मा स्वरूपा हो तुम श्री श्रींकारा महाविद्या श्रद्धा वती हो आप खाली करा ली कालिया चकला दैत्य विनाशिनी हो मां मुझे अब तो शत्रु से बचा लो पुराण स्मृतियां दर्शन शास्त्र तंत्र शास्त्र आपके गुणगान का 24 घंटे जब करते रहते हैं मैं तो बालक मेरी विनती को स्वीकार लो आर्थिक संकटों से बचा लो शत्रुओं ने चारों तरफ से घेर लिया है आप नहीं तो कौन बचाएगा क्योंकि आप दुर्गा शिवा शांति करी ब्रह्माणी ब्राह्मण प्रिया हो पितांबरा परिधाना पीतगंधनुलेवना मां अब मुझे आशीर्वाद देकर सारे संकटों से मुक्त कर दो यही मेरी प्रार्थना है।
माँ बगलामुखी मंदिर नलखेड़ा का इतिहास
माँ बगलामुखी मंदिर मध्य प्रदेश के आगर मालवा जिले के नलखेड़ा नगर में लखुन्दर नदी के के पूर्वी तट पर स्थित है। यह मंदिर पांडव कालीन अति प्राचीन है मंदिर के गर्भ गृह में माता बगलामुखी की स्वयंभू प्रतिमाह के रूप में विराज मान है तथा माता के साथ दाये बाये महालक्ष्मी महा सरस्वती विराज मान है।
यह मंदिर देश विदेश में अति प्रचलित है एवं चमत्कारिक भी है। मंदिर परिसर में भैरव ,हनुमान व पारदेश्वर राधे कृष्ण मंदिर के साथ ऋषि मुनियों की अति प्राचीन जाग्रित समाधिया स्तिथ है जो की मंदिर को अति प्राचीन होने का प्रमाण देती है मंदिर की मान्यता अनुसार माता त्वरित फल दाई है इसीलिये मंदिर में विभिन्न राज्यों से तथा देश विदेशो से भी लोग माता के दर्शन के लिये आते है एवं विशेष कार्य के लिये माता मंदिर में अनुष्ठान एवं हवन पूजन कर माता का आशिर्वाद प्राप्त करते है।
मंदिर के चारो तरफ शमशान है मंदिर श्मशान के मद्य्य में स्तिथ है मान्यता के अनुसार माता तंत्र की अदिशधात्री एवं श्मशान वासनी है इसी लिये माता के दरबार मे अनेकों साधु संत विशेष तंत्र प्रियोग के लिये आते है।
प्राचीन तंत्र ग्रंथों में दस महाविद्याओं का उल्लेख है जिनमें से एक है बगलामुखी । माँ भगवती बगलामुखी है इनका महत्व समस्त देवियों में सबसे विशिष्ट है। विश्व में इनके सिर्फ तीन ही महत्वपूर्ण प्राचीन मंदिर हैं, जिन्हें सिद्धपीठ कहा जाता है। यह मन्दिर उन्हीं में से एक बताया गया है।
मंदिर के बाहर सोलह स्त्म्भों वाला एक सभामंडप है जो आज से लगभग २५२ वर्षों से संवत १८१६ में पंडित ईबुजी दक्षिणी कारीगर श्रीतुलाराम ने बनवाया था। इसी सभामंड़प में एक कछुआ भी स्थित है जो देवी की मूर्ति की ओर मुख करता हुआ है। यहा पुरातन काल से देवी को बलि चढ़ाई जाती थी। मंदिर के सामने लगभग ८० फीट ऊँची एक दीप मालिका बनी हुई है, जिसका निर्माण राजा विक्रमादित्य द्वारा ही करवाया गया था।
मंदिर में लोग अपनी मनोकामना पूर्ति हेतु एवं विभिन्न क्षेत्रों में विजय प्राप्त करने के लिए यज्ञ, हवन या पूजन-पाठ कराते हैं। मुख्य पुजारी गोपाल दास जी पंडा, मनोहरलाल जी पंडा ने बताया कि बगलामुखी माता तंत्र की देवी हैं, अतः यहाँ पर तांत्रिक अनुष्ठानों का महत्व अधिक है। इस मंदिर की मान्यता इसलिए भी अधिक है, क्योंकि यहाँ की मूर्ति स्वयंभू और जागृत है।
मंदिर में बहुत से वृक्ष हैं, जिनमें बिल्वपत्र, चंपा, सफेद आँकड़ा, आँवला, नीम एवं पीपल के वृक्ष स्थित हैं। इसके नवरात्रि के अवसर पर यहाँ भक्तों का ताँता लगा रहता है। मुख्यपूजारी ने बताया है कि उनका परिवार कई पीढ़ियों से माता की सेवा करते आ रहा है और उन्हें कई बार माता के साक्षात् होने का अनुभव हुआ है मंदिर के पीछे लखुन्दर नदी (जिसका पुराना नाम लक्ष्मणा है) के तट पर संत व मुनियो की कई समाधियाँ जीर्ण अवस्था में स्थित है, जो आज भी इस मंदिर में संत मुनियों का रहने का प्रमाण है।